मुंबई के चोर बाजार से चीन तक हो रही तस्करी…कबाड़ नहीं, आप बेच रहे हैं ‘डेटा बम’ !

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चल रहा है चोर बाजार से साइबर माफिया तक ‘काला खेल’

मुंबई : जिस मोबाइल को आप बेकार समझकर कबाड़ी के हवाले कर देते हैं, वही मोबाइल अब साइबर माफियाओं के लिए करोड़ों का माल बन चुका है। चौंकाने वाली बात यह है कि बंद, टूटे और पूरी तरह डेड मोबाइलों की मेमोरी चिप और रैम कथित तौर पर मुंबई के चोर बाजार से होते हुए विदेशी गिरोहों तक पहुंच रही हैं। आशंका है कि इन्हीं चिप्स से लाखों भारतीयों का संवेदनशील डेटा निकाला जा सकता है।

गली-गली घूमने वाले कबाड़ी कुछ सौ रुपयों या प्लास्टिक के बर्तन देकर पुराने मोबाइल खरीद लेते हैं। इसके बाद यह माल कई हाथों से गुजरते हुए मुंबई के चोर बाजार पहुंचता है। यहां आधी रात के बाद रैम, मदरबोर्ड और मेमोरी चिप्स की बोली लगती है। सूत्रों का दावा है कि इस इलेक्ट्रॉनिक कबाड़ में सिर्फ लोहे-तांबे की कीमत नहीं, बल्कि उसमें छिपे डेटा की कीमत भी शामिल होती है। एक कारोबारी ने नाम न छपने की बात पर बताया कि ‘चीन और हांगकांग से डिमांड आती है।’ इस एक जवाब ने पूरे खेल पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर भारतीयों के पुराने मोबाइलों का डेटा किसके हाथों में जा रहा है? साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि मोबाइल का स्क्रीन टूट जाना या फोन बंद हो जाना यह साबित नहीं करता कि उसका डेटा खत्म हो गया है। प्रशिक्षित तकनीशियन और आधुनिक उपकरण कई बार डेड डिवाइस से भी डेटा रिकवर कर सकते हैं। यही वजह है कि साइबर गिरोह पुराने मोबाइलों में खास दिलचस्पी दिखा रहे हैं।

डेटा चोरी का नया रास्ता

सवाल यह है कि क्या ई-कचरे के नाम पर देश से संवेदनशील डिजिटल जानकारी बाहर भेजी जा रही है? क्या लोगों की निजी तस्वीरें, दस्तावेज, बैंकिंग रिकॉर्ड और संपर्क सूची इस अवैध नेटवर्क के निशाने पर हैं? जांच एजेंसियों के लिए यह सिर्फ कबाड़ का मामला नहीं, बल्कि राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा बनता जा रहा है।

५२ से २ हजार रुपए किलो तक रेट

इस कारोबार का अपना ‘रेट कार्ड’ है। मोबाइल की रैम और मदरबोर्ड का भाव उसकी स्टोरेज क्षमता के अनुसार तय होता है। जितना अधिक स्टोरेज, उतनी अधिक कीमत। यानी आपके फोन में जितनी ज्यादा जानकारी, उतनी ज्यादा उसकी ‘मार्केट वैल्यू’।

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