निजी आजादी पर रोक क्यों

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देश में गाहे-बगाहे असहमति के अधिकार और व्यक्तिगत आजादी पर अंकुश लगाने के प्रयासों पर चर्चा होती ही रहती है। अब सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां के हालिया बयानों ने इस मुद्दे को एक बार फिर सार्वजनिक विमर्श का विषय बनाया है। दरअसल, पिछले हफ्ते भोपाल स्थित नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी में एक व्याख्यान देते हुए उन्होंने उत्तर प्रदेश में चौदह युवाओं की गिरफ्तारी और उन्हें लंबे समय तक हिरासत में रखने के मुद्दे पर तल्ख सवाल उठाए थे। दरअसल, मार्च 2026 में इन युवाओं पर आरोप लगा था कि उन्होंने उत्तर प्रदेश के वाराणसी में गंगा नदी में नाव की सवारी के दौरान इफ्तार के दौरान चिकन बिरयानी खाई थी और बिरयानी के बचे अवशेष नदी में डाल दिए थे। स्थानीय स्तर पर मामले के तूल पकड़ने के बाद इन चौदह युवाओं को गिरफ्तार किया गया था। जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने इस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा था कि गंगा नदी के ऊपर या किनारे चिकन बिरयानी खाना कोई कानूनी अपराध नहीं है। उनका कहना था कि किसी भी कानून में ऐसी गतिविधि पर रोक नहीं है। जस्टिस भुइयां ने इसके साथ ही शांतिपूर्ण असहमति को अपराध की श्रेणी में लाने के बढ़ते चलन पर भी चिंता जताई। दूसरे शब्दों में कहें तो उन्होंने भारतीय लोकतंत्र की सेहत से जुड़े ज्वलंत प्रश्नों को सार्वजनिक बहस का हिस्सा बनाया है। तो सवाल उठता है कि क्या केंद्र सरकार लोगों की निजी पसंद, अभिव्यक्ति की आजादी और विरोध करने के अधिकार पर रोक लगाने में हद से आगे बढ़ रही है? क्या नागरिकों को उन कामों के लिये उनकी आजादी से वंचित किया जा सकता है जो कुछ लोगों की भावनाओं को ठेस तो पहुंचा सकते हैं, लेकिन स्पष्ट रूप से अपराध की श्रेणी में नहीं आते? हाल-फिलहाल के घटनाक्रमों के आलोक में बीस जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की कार्रवाई को देखते हुए, न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की राय से असहमत होना मुश्किल ही कहा जाएगा। उनकी राय थी कि असहमति के लिये जगह कम होती जा रही है।

दरअसल, हाल के वर्षों में अक्सर देखा गया है कि देश में पर्यावरण कार्यकर्ता, छात्र, विभिन्न संगठन और दूसरे नागरिक जो असहमति जताते हैं, उन्हें अक्सर आपराधिक मामलों का सामना करना पड़ता है। लेकिन सरकार प्रतिरोध के स्वरों की अनसुनी कर देती है। हालांकि, देर-सवेर अदालतें, अक्सर मामले के कानूनी प्रक्रिया में आने के बाद उन्हें राहत दे देती हैं। लेकिन अक्सर जमानत में होने वाली देरी और सख्त शर्तें अपने आप में सजा का ही एक रूप बन सकती हैं। निस्संदेह, इस आलोक में देश की न्यायपालिका को भी, जो संवैधानिक अधिकारों की संरक्षक भी है, अपनी भूमिका की नये सिरे से समीक्षा करनी चाहिए। सिर्फ न्यायिक फैसलों से ही आजादी की रक्षा नहीं की जा सकती। निर्विवाद रूप से प्रक्रिया से जुड़े सुरक्षा उपाय भी मायने रखते हैं क्योंकि प्रक्रिया खुद नागरिकों के जीवन पर असर डालती है। इस बात में दो राय नहीं हो सकती है कि सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की न्यायिक जवाबदेही की मांग बहुत सही समय पर सामने आई है। निर्विवाद रूप से आलोचना से अदालतें कमजोर नहीं होती हैं वरन जब उसके फैसलों की खुलकर समीक्षा की जाती है तो वे और मजबूत होती हैं। संस्थाओं में जनता का भरोसा उसकी कार्यशैली, तर्क और विनम्रता से ही आता है, न कि जांच-पड़ताल से बचने की प्रवृत्ति से। न्यायमूर्ति ने अपनी बात कहकर सार्वजनिक विमर्श के लिये इस मुद्दे को रख दिया है। अब देश के विभिन्न पक्षों को यह समझना होगा कि लोकतंत्र तभी अपनी गरिमा के साथ आगे बढ़ सकता है जब नागरिकों में वैचारिक आजादी की पर्याप्त जगह हो। जब किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिक बेबाकी से अपने हित से जुड़े सवाल पूछ सकें और सत्ता के समक्ष निर्भीक होकर सच बोलने के लिये आजाद हों तो इससे सही अर्थों में लोकतंत्र की मूल भावनी पुष्ट ही होती है। देश के नीति-नियंताओं को भी न्यायमूर्ति के उद्गारों पर चिंतन-मनन करने की जरूरत है।

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