राष्ट्र निर्माण की अदृश्य आधारशिला का मूल्यांकन।

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हाल ही में देश की सर्वोच्च अदालत ने ‘शिशुपाल उर्फ शिशराम एवं अन्य बनाम सुरजीत एवं अन्य’ मामले में एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए भारतीय समाज के समक्ष उपस्थित एक ऐसे प्रश्न को पुनः केंद्र में ला खड़ा किया है, जिस पर लंबे समय से पर्याप्त गंभीरता से विचार नहीं किया गया। न्यायालय ने गृहिणियों को ‘राष्ट्र निर्माता’ की संज्ञा देते हुए कहा कि उनके द्वारा किया जाने वाला घरेलू श्रम केवल परिवार के संचालन तक सीमित नहीं है, बल्कि वह राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है।

न्यायालय ने निर्देश देते हुए कहा कि ‘जब कोई मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण, उच्च न्यायालय अथवा यह न्यायालय किसी ऐसे मामले पर विचार कर रहा हो, जिसमें एक गृहिणी की मृत्यु हुई हो, तब मुआवजे की गणना में गृहिणियों के साथ होने वाली उस अंतर्निहित असमानता को दूर करने के लिए, जो उनकी अनुमानित आय के अत्यंत रूढ़िवादी आकलन के कारण उत्पन्न होती है, ‘घरेलू देखभाल की हानि’ के अंतर्गत 30,000 रुपये प्रतिमाह की एक समेकित राशि जोड़ी जानी चाहिए।’ न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि इस राशि में प्रत्येक तीन वर्ष के अंतराल पर संचयी रूप से 10 प्रतिशत की वृद्धि की जाएगी।

प्रथम दृष्टया यह निर्णय मोटर दुर्घटना मुआवजा दावों में क्षतिपूर्ति निर्धारण से संबंधित एक सामान्य न्यायिक आदेश प्रतीत हो सकता है, किन्तु वास्तव में इसका महत्व इससे कहीं अधिक व्यापक है। यह निर्णय केवल 30,000 रुपये प्रतिमाह की राशि निर्धारित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि उस दृष्टिकोण में परिवर्तन का प्रतीक है, जिसके माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय ने घरेलू श्रम के सामाजिक और आर्थिक मूल्य को स्वीकार किया है। लंबे समय तक भारतीय समाज में घर के भीतर किए जाने वाले कार्यों को प्रेम, कर्तव्य और पारिवारिक दायित्व के रूप में देखा जाता रहा, जबकि उनके आर्थिक महत्व पर अपेक्षित गंभीरता से विचार नहीं किया गया।

निःसंदेह, किसी भी परिवार का सुचारु संचालन केवल आर्थिक आय पर निर्भर नहीं करता। भोजन की व्यवस्था, बच्चों का पालन-पोषण, वृद्धजनों की देखभाल, परिवार के सदस्यों की आवश्यकताओं का समन्वय, घर का प्रबंधन तथा भावनात्मक संतुलन बनाए रखने जैसे असंख्य कार्य प्रतिदिन किए जाते हैं, जिनके लिए कोई

वेतन निर्धारित नहीं होता। विडंबना यह है कि जिन कार्यों के बिना परिवार की संरचना की कल्पना भी नहीं की जा सकती, वही कार्य लंबे समय तक आर्थिक मूल्यांकन की प्रक्रिया से बाहर रहे। उक्त निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने आगे कहा कि ‘यह विडंबनापूर्ण है कि गृहिणी को परिवार के कमाने वाले सदस्यों पर आश्रित बताया जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि परिवार की पूरी व्यवस्था और सुचारु संचालन काफी हद तक गृहिणी पर ही निर्भर करता है।’

वास्तव में यह टिप्पणी भारतीय समाज में लंबे समय से प्रचलित उस धारणा को चुनौती देती है, जिसके अनुसार आर्थिक आय अर्जित करने वाला व्यक्ति ही परिवार का मुख्य योगदानकर्ता माना जाता है। यदि किसी परिवार की आय उसके आर्थिक आधार को सुदृढ़ करती है, तो घर के भीतर किया जाने वाला श्रम उस आधार को स्थायित्व प्रदान करता है। दोनों में से किसी एक के अभाव में परिवार की संरचना पूर्ण नहीं हो सकती। इसलिए घरेलू श्रम को केवल एक पारिवारिक दायित्व मानना उसके वास्तविक महत्व को कम करके आंकना होगा। न्यायालय ने अपने निर्णय में यह भी रेखांकित किया कि ‘गृहिणियों का योगदान केवल बच्चों के जन्म और पालन-पोषण तक सीमित नहीं है। वे उस मानव पूंजी के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, जिस पर किसी भी राष्ट्र की सामाजिक और आर्थिक प्रगति आधारित होती है।’ यह निर्विवादित है कि किसी भी समाज का भविष्य केवल उसके उद्योगों, संस्थानों अथवा आर्थिक नीतियों से निर्मित नहीं होता, बल्कि उन मानवीय मूल्यों, संस्कारों और क्षमताओं से भी निर्मित होता है, जिनका विकास परिवार के भीतर होता है।

वर्तमान निर्णय का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि सर्वोच्च न्यायालय ने क्षतिपूर्ति निर्धारण के संबंध में विकसित हो रहे न्यायशास्त्र को भी आगे बढ़ाया है। इस संदर्भ में न्यायालय ने ‘नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम प्रणय सेठी एवं अन्य’ के ऐतिहासिक निर्णय का उल्लेख किया, जिसमें क्षतिपूर्ति निर्धारण के लिए कुछ पारंपरिक मदों, जैसे संपत्ति की हानि, साहचर्य की हानि तथा अंत्येष्टि व्यय को मान्यता प्रदान की गई थी। ‘शिशुपाल उर्फ शिशराम एवं अन्य बनाम सुरजीत एवं अन्य’ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने इस न्यायिक दृष्टिकोण का विस्तार करते हुए

‘घरेलू देखभाल की हानि’ को भी एक महत्वपूर्ण आधार के रूप में स्वीकार किया है।

यह परिवर्तन केवल विधिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत अर्थपूर्ण है। किसी गृहिणी की मृत्यु के पश्चात परिवार को केवल भावनात्मक आघात ही नहीं पहुंचता, बल्कि वर्षों से संचालित हो रही देखभाल, मार्गदर्शन, संरक्षण और घरेलू प्रबंधन की वह व्यवस्था भी प्रभावित होती है, जिसका कोई प्रत्यक्ष आर्थिक मूल्य निर्धारित नहीं किया जाता। न्यायालय ने वस्तुतः इसी अदृश्य हानि को पहचानने और उसका न्यायसंगत मूल्यांकन करने का प्रयास किया है।

इस निर्णय का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष वह व्यापक आर्थिक दृष्टिकोण है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने अपनाया है। न्यायालय ने स्वीकार किया कि महिलाओं द्वारा किए जाने वाले अवैतनिक घरेलू एवं देखभाल संबंधी कार्य का आर्थिक मूल्य भारत की सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 15 से 17 प्रतिशत के समतुल्य आंका गया है। इसके बावजूद यह श्रम न तो औपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा माना जाता है और न ही उसे वह सामाजिक तथा आर्थिक मान्यता प्राप्त होती है, जिसका वह वास्तविक रूप से अधिकारी है। वस्तुतः यह स्थिति भारतीय अर्थव्यवस्था और समाज के उस महत्वपूर्ण योगदान की ओर ध्यान आकर्षित करती है, जो प्रतिदिन किया तो जाता है, किंतु प्रायः औपचारिक गणनाओं और नीतिगत विमर्श में पर्याप्त स्थान नहीं पाता ।

निश्चय ही यह निर्णय उस व्यापक सामाजिक परिवर्तन की ओर भी संकेत करता है, जिसमें पारिवारिक भूमिकाओं को पारंपरिक रूढ़ धारणाओं से परे जाकर समझने की आवश्यकता है। बदलते सामाजिक और आर्थिक परिवेश में घर तथा परिवार की देखभाल का दायित्व केवल महिलाओं तक सीमित नहीं रह गया है। आज अनेक परिवारों में पुरुष भी बच्चों के पालन-पोषण, घरेलू प्रबंधन तथा परिवार की दैनिक आवश्यकताओं के निर्वहन में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं ।

ऐसी स्थिति में ‘होम मेकर’ की अवधारणा को केवल किसी एक लिंग से जोड़कर देखना न तो सामाजिक यथार्थ के अनुरूप है और न ही न्याय के व्यापक सिद्धांतों के। घरेलू श्रम का मूल्य उसके स्वरूप और योगदान में निहित है, न कि उसे करने वाले व्यक्ति के लिंग में। संभवतः यही कारण है कि सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में ‘गृहिणी’ के प्रश्न पर विचार करते हुए भी घरेलू देखभाल और पारिवारिक उत्तरदायित्वों के महत्व को अधिक व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने का प्रयास किया है ।

निस्संदेह किसी गृहिणी के योगदान का पूर्ण मूल्यांकन किसी धनराशि में नहीं किया जा सकता। तथापि यह निर्णय इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम अवश्य है कि घर की चारदीवारी के भीतर किया जाने वाला श्रम भी उतना ही सम्मान और मान्यता प्राप्त करे, जितना समाज में दिखाई देने वाला अन्य कोई कार्य। न्यायालय का यह निर्णय केवल क्षतिपूर्ति निर्धारण का एक नया मानदंड नहीं, बल्कि घरेलू श्रम की गरिमा और उसके सामाजिक महत्व की औपचारिक स्वीकृति के रूप में भी स्मरण किया जाएगा ।

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