अक्तूबर, 2025 में, मध्य प्रदेश के एक जिले में संदूषित कफ सिरप पीने से बच्चों की मौत की ख़बरों ने देश को झकझोर दिया था। अब, जून, 2026 में, भारत सरकार ने कुछ नियम बदले हैं और ‘शेड्यूल के’ से सभी सिरप को अनुमति सूची से हटा दिया है। ‘शेड्यूल के’ में गांवों या ऐसी जगहों पर, जहां पर आबादी एक हज़ार से कम है, गैर-फ़ार्मेसी दुकानों पर भी सिरप बिक्री को मंजूरी थी। अब पूरे देश में, दवा युक्त सिरप आम दुकानों पर नहीं रखी जा सकती और उनकी बिक्री डॉक्टर की पर्ची पर होना अनिवार्य है।
मध्य प्रदेश की कफ सिरप त्रासदी के बाद जांच हुई और कुछ नियामक पहल हुई। इस घटना की याद ने नीतिगत फैसले को आकार दिया है। हालांकि, इसे मोटे तौर पर कफ सिरप की बिक्री के लिए डॉक्टर की पर्ची अनिवार्य किए जाने के फैसले के तौर पर देखा जा रहा है, लेकिन सच तो यह है कि ज़्यादातर दवा युक्त कफ सिरपों में (हर्बल सिरप को छोड़कर) ऐसे तत्व होते हैं, जिनकी खरीद या बेचने से पहले डॉक्टर की पर्ची की अनिवार्यता हमेशा से थी। मगर, पालन नहीं किया जाता था।
यह नीतिगत फ़ैसला स्पष्ट रूप से पर्ची की अनिवार्यता को सुदृढ़ करता है। सभी सिरपों में, भारत में सबसे अधिक गलत इस्तेमाल कफ़ सिरप का होता है। कई लोग बीमारी की सही शिनाख्त करवाए बिना खुद से इन्हें खरीद लेते हैं, छूत से लगी सर्दी-खांसी मेंइनका इस्तेमाल करते हैं जबकि इनसे फायदा बहुत कम होता है। सुरक्षा संबंधी चिंताओं के बावजूद यह छोटे बच्चों को बार-बार खुराक दी जाती है। धारणा बना ली कि मीठा तरल नुकसानदायक प्रतीत नहीं होता। कुछ सिरप फार्मूलों में एंटीहिस्टामाइन, डिकंजेस्टेंट, सिडेटिव, ओपिओइड या अल्कोहल जैसे तत्व होते हैं, जो फ़ायदे के बजाय नुकसान अधिक पहुंचा सकते हैं। किशोरों और वयस्कों में भी कुछ किस्म के सिरप का गलत इस्तेमाल होता है। पर्ची की अनिवार्यता बनने से लोग आसानी से इन्हें नहीं खरीद पाएंगे, पहले डॉक्टर से मिलना ज़रूरी हो जाएगा।
फिर भी, यह कहानी का सिर्फ एक हिस्सा है। कई परेशान माता-पिता के लिए बच्चे की खांसी चिंताजनक हो जाती है, और डॉक्टर के पास जाने पर अगर सिरप न लिखा जाए तो उन्हें अक्सर लगता है कि इलाज अधूरा रह गया। मरीज़ अक्सर कफ सिरप लिखने की मांग करते हैं और अगर डॉक्टर मना कर दे, तो कुछ परिवार किसी दूसरे डॉक्टर का रुख करते हैं, जो इसे लिख दे। पुरानी पर्चियों को भी संभालकर रखा जाता है और मिलते-जुलते लक्षणों के
लिए वही दवा दोबारा खरीदने में इस्तेमाल किये जाते हैं। ऐसे हालात में, नियमों में यह बदलाव गलत इस्तेमाल को कम कर सकता है, पर्ची की अनिवार्यता होने को मजबूत करता है और गलत इस्तेमाल को बढ़ावा देने वाले व्यवहार को बदल सकता है।
बेशक, यह बदलाव स्वागतयोग्य है, लेकिन काफ़ी नहीं है। मध्य प्रदेश की कफ सिरप त्रासदी मुख्य रूप से डॉक्टर की पर्ची न होने के कारण नहीं हुई थी। यह बच्चों तक संदूषित उत्पाद पहुंचने के कारण हुई। जब डायथिलीन ग्लाइकॉल या एथिलीन ग्लाइकॉल-वे औद्योगिक रसायन, जो दवाओं में कदापि नहीं होने चाहिए किसी सिरप में मिला दिए जाएँ, तो यह व्यवस्था-तंत्र की विफलता है, जिसकी ज़िम्मेदारी ऊपर स्तर पर बैठे नियामकों की है। इसमें कच्चे माल की खरीद, परीक्षण, लाइसेंसिंग, निरीक्षण और बाज़ार से उत्पाद हटाने जैसी प्रक्रियाओं की प्रभावी निगरानी आवश्यक होती है। डॉक्टर की परामर्श पर्ची उपयोग को तो नियंत्रित कर सकती है, लेकिन संदूषित खेप को सुरक्षित नहीं बना सकती।
अन्य देश इस बाबत उपयोगी सबक हो सकते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में, खांसी और जुकाम की कुछ दवाएं बिना डॉक्टर की पर्ची के उपलब्ध हैं, लेकिन नियामक दो साल से कम उम्र के बच्चों में इनके उपयोग पर चेतावनी देते हैं, और निर्माता आमतौर पर चार साल से कम उम्र के बच्चों के लिए उपयोग के खिलाफ लेबल पर लिखा होता है। यूनाइटेड किंगडम में, कई खांसी और जुकाम की दवाएं छह साल से कम उम्र के बच्चों के लिए अनुशंसित नहीं हैं, जबकि छह से बारह वर्ष की आयु के बच्चों में उनका उपयोग स्वास्थ्य कर्मी की देख-रेख में होता है। ऑस्ट्रेलिया ने भी छोटेबच्चों में इसके उपयोग को हतोत्साहित किया है और लेबल पर बाकायदा चेतावनी छापने को कड़ा कर रखा है। ये देश दुर्घटना अवसर घटाने के लिए केवल डॉक्टर की पर्ची पर निर्भर नहीं हैं। वे आयु प्रतिबंध, चेतावनी लेबल, डाक्टरी परामर्श, विष नियंत्रण प्रणाली, प्रतिकूल घटना पर त्वरित सूचना और निगरानी उपायों का उपयोग करते हैं।
भारत को एक बहुस्तरीय दृष्टिकोण की आवश्यकता है। सर्वप्रथम, दो साल से कम उम्र के बच्चों को खांसी और जुकाम की दवाइयां न तो लिखी जानी चाहिए और न ही दी जानी चाहिए, सिवाय कुछ दुर्लभ मामलों में विशेषज्ञ की सलाह पर। इनसे बड़े बच्चों के लिए, मानकीकृत देखभाल की शुरुआत, दिलासा देने, तरल पदार्थ देकर, जरूरत पड़ने पर बुखार नियंत्रण, सेलाइन ड्रॉप्स, एक सालकी उम्र के बाद शहद देना और स्पष्ट चेतावनी संकेतों को बूझना, जिन्हें चिकित्सकीय ध्यान की आवश्यकता है, जैसे उपायों से हो सकती है। माता-पिता को यह पता होना चाहिए कि ज्यादातर खांसी एक संक्रमण रोग है, अपने आप ठीक हो जाती है और इसके लिए सिरप की जरूरत नहीं होती।
दूसरा, उत्पादन नियमों को और अधिक सुदृढ़ किया जाना चाहिए। प्रत्येक पी जाने वाली दवा, जिसमें ग्लिसरीन, प्रोपिलीन ग्लाइकॉल या सॉर्बिटोल जैसे सहायक पदार्थ शामिल होते हैं, उनकी विषाक्तता की अनिवार्य जांच की जानी चाहिए। कच्चे माल के आपूर्तिकर्ता लाइसेंस धारक हों, और उन पर नजर रखी जानी चाहिए। राज्य औषधि नियामकों को प्रशिक्षित निरीक्षकों, आधुनिक प्रयोगशालाएं, डिजिटल रिकॉर्ड और दबाव से मुक्ति की आवश्यकता है। बार-बार उल्लंघन करने पर केवल अस्थायी निलंबन ही नहीं, बल्कि मुकदमा और लाइसेंस रद्द करने की कार्रवाई भी होनी चाहिए।
तीसरा, विषाक्ता का पता लगने पर शेष दवा को बाज़ार से तुरंत हटाने वाली प्रणाली होना जरूरी है। एक बार दूषित उत्पाद का संदेह होने पर, सूचना दिनों की बजाय घंटों में प्रसारित होनी चाहिए। एक राष्ट्रीय डिजिटल दवा रिकॉल प्लेटफॉर्म हो, जोकि बैच नंबर, फार्मेसियों, डॉक्टरों, अस्पतालों और आम जनता से जुड़ा हो, इससे कई जानें बच सकती हैं। हर बोतल पर एक क्यूआर कोड होना चाहिए जिसके माध्यम से माता-पिता निर्माता, बैच नंबर, समाप्ति तिथि और रिकॉल की स्थिति की पुष्टि कर सकें।
चौथा, डॉक्टरों और दवा विक्रेताओं को अपने काम करने के तरीके में बदलाव करना होगा। परामर्श पर्ची में बीमारी की शिनाख्त, उम्र के हिसाब से दवा की मात्रा और कितने समय तक दवा देनी है, यह सब दर्ज हो। खांसी की मिश्रित दवाएं (कॉम्बिनेशन सिरप) का इस्तेमाल बिना सोचे-समझे नहीं करना चाहिए। दवा विक्रेताओं को बिक्री का रिकॉर्ड रखना चाहिए, तीमारदारों को जानकारी युक्त करना और असुरक्षित मांगों को साफ इंकार कर देना चाहिए। व्यावसायिक संस्थाओं को चाहिए कि आसानी से समझ आने वाली और व्यावहारिक दिशा-निर्देश जारी करें, जिनका पालन व्यस्त क्लीनिक और फार्मेसियों में किया जाना है। आखिर में, समुदायों को भागीदार के तौर पर लिया जाना ज़रूरी है। आंगनवाड़ी कर्मी, ‘आशा’ कर्मी, स्कूल अध्यापक, बच्चों के डॉक्टर, फैमिली डॉक्टर और लोकल मीडिया तीन आसान बातें लोगों तक पहुंचा सकते हैं: छोटे बच्चों को खुद से तय करके दवा न दें, पुरानी सिरप पर्ची का दोबारा इस्तेमाल न करें। अगर किसी दवा सेवन के बाद बच्चे को पेशाब कम आए, लगातार उल्टी हो, सुस्ती छाए, सांस तेज़ चले या बीमारी और बढ़ जाए, तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं। पंचायतें और रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन ‘सुरक्षित दवा दिवस’ मना सकते हैं, जिनमें परिवार दवाइयों को सुरक्षित तरीके से जांचना, रखना और फेंकना सीख सकें। अधिकारियों को इस गलतफहमी से बचना चाहिए कि सिर्फ़ बिक्री का तौर-तरीका बदलने से सुरक्षा की संपूर्ण श्रृंखला दुरुस्त हो जाएगी। असली काम एक ऐसा दवा प्रणाली बनाना है जिसमें दवाएं उत्तम गुणवत्ता की हों, परामर्श तार्किक हों, दवा विक्रेता की ज़िम्मेदारी तय हो, नागरिक जानकारी युक्त हों और नियामक किसी बड़ी घटना के होने से पहले ही कदम उठा लें। सवाल यह भी है कि क्या भारत घटना-आधारित उपाय करने से हटकर रोज़मर्रा की दवा-सुरक्षा की ओर बढ़ सकता है।