
नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार देश के एक लाख 19 हजार सरकारी स्कूलों में बिजली नहीं है; 98,592 स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय नहीं है; चौदह हजार से अधिक स्कूलों में पीने का पानी नहीं है; एक लाख से अधिक स्कूलों में सिर्फ एक अध्यापक एक से अधिक कक्षाओं को पढ़ा रहा है। स्कूली शिक्षा प्रणाली के संदर्भ में ‘नीति’ आयोग ने एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की है। यह विडंबना ही है कि ‘नीट’ की परीक्षा में हुई धांधली की धूल में नीति-आयोग की यह रिपोर्ट कहीं खो सी गयी है। इस रिपोर्ट के कुछ आंकड़े सिर्फ चौंकाते ही नहीं, परेशान भी करते हैं। जैसे, यह रिपोर्ट बताती है कि देश में सरकारी और निजी स्कूलों की स्थितियों का अंतर शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र की उपेक्षा को ही उजागर नहीं करता, बल्कि यह भी बता रहा है कि देश के भविष्य को लेकर हमारी चिंताएं कितनी खोखली हैं। प्रधानमंत्री एक से अधिक अवसरों पर अपने भाषणों में इस आशय के दावे कर चुके हैं कि देश शिक्षा के क्षेत्र में बहुत तेजी से विकास कर रहा है। मसलन, एक भाषण में उन्होंने कहा था कि देश में प्रति सप्ताह एक नया विश्वविद्यालय खुल रहा है, हर रोज एक नया कॉलेज खुल रहा है। प्रधानमंत्री आईआईटी और आईआईएम के विस्तार के दावे भी कर चुके हैं। लेकिन नीति-आयोग की यह रिपोर्ट शिक्षा क्षेत्र की बुनियादी कमजोरियों को उजागर कर रही है। पिछले एक दशक के विश्लेषण पर आधारित यह रिपोर्ट बता रही है कि हमने शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र को सरकारी और गैर-सरकारी में बांटकर समूची शिक्षा प्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिये हैं। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार देश के एक लाख 19 हजार सरकारी स्कूलों मेंबिजली नहीं है; 98,592 स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय नहीं है; चौदह हजार से अधिक स्कूलों में पीने का पानी नहीं है; एक लाख से अधिक स्कूलों में सिर्फ एक अध्यापक एक से अधिक कक्षाओं को पढ़ा रहा है। रिपोर्ट में ऐसे और भी कई आंकड़े हैं जो यह बताते हैं कि शिक्षा जैसे बुनियादी क्षेत्र मेंहम किस तरह की आपराधिक उपेक्षा बरत रहे हैं। उदाहरण के लिए सन् 2017 और 2024 के बीच देश में 87000 से अधिक सरकारी स्कूल बंद हो गये, इसकी तुलना में निजी स्कूलों की जैसे बाढ़-सी आ रही है। यह सही है कि हाल के कुछ सालों में, विशेष कर कोरोना-काल के बाद सरकारी स्कूलों में दाखिला लेने वालों की संख्या कुछ बढ़ी है, पर इसका कारण शिक्षा का स्तर नहीं, अभिभावकों की आर्थिक विवशता कहीं अधिक है।वैसे, यह भी एक विडंबना ही है कि आज देश में हमारी शिक्षा भी गरीब और अमीर में बंट गयी है। मान लिया गया है कि आर्थिक अभावों से जूझ रहे परिवारों के बच्चों की विवशता है कि वे सरकारी स्कूलों में जाएं जहां पढ़ाई लगभग मुफ्त होती है। आर्थिक स्थिति जरा-सी भी सुधरती है तो यह अभिभावक महंगे स्कूलों की ओर रुख कर लेते हैं। शिक्षा के क्षेत्र का यह बंटवारा हमारी प्राथमिक चिंता होनी चाहिए। स्कूलों में प्राथमिक स्तर पर ही विद्यार्थियों को ‘छोटे-बड़े’ का अहसास दिलाने वाली हमारी शिक्षा-नीति एक तरह से शिक्षा के अधिकार के हमारे दावों को ही झुठला रही है।
हम देश के हर बच्चे के शिक्षा के अधिकार की बात तो करते हैं, पर किस प्रकार की शिक्षा दी जा रही है इस बारे में शायद सोचना ही नहीं चाह रहे। सन् 2021-22 में हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार देश में 10,22,386 सरकारी और 3,35,844 निजी स्कूल हैं। यहां निजी स्कूल का मतलब महंगी पढ़ाई और बेहतर सुविधा है। यह कतई ज़रूरी नहीं है कि महंगी पढ़ाई का मतलब अच्छी पढ़ाई ही हो- हां, इन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे और पढ़ाने वाले अभिभावक यह अहसास अवश्य जीते हैं कि उनका स्तर ‘ऊंचा’ है। शिक्षा के क्षेत्र में इस तरह के बीमार सोच का पालन उन सबके लिए चिंता की बात होनी चाहिए जो समता-समानता के दर्शन वाले संविधान के प्रति निष्ठा रखते हैं।पढ़ेगा इंडिया बढ़ेगा इंडिया’ का नारा देने वाले को इस बात की भी चिंता होनी चाहिए कि ‘इंडिया’ क्या पढ़ रहा है? कैसी पढ़ाई कर रहा है। दुर्भाग्य से यह चिंता कहीं दिखाई नहीं देती। नीति-आयोग की इस महत्वपूर्ण रिपोर्ट में हमारे स्कूलों की स्थितियों को तो अच्छे ढंग से दिखाया गया है, पर जिस तरह से यह रिपोर्ट अचर्चित ही रही है, वह हमारी चिंता का विषय होना चाहिए। आखिर हमें दो तरह की शिक्षा की आवश्यकता क्यों है? क्यों नहीं देश के हर बच्चे को एक समान और अच्छे स्तर की शिक्षा मिलनी चाहिए? इस बारे में हमारा छोटा-सा पड़ोसी देश नेपाल भी हमें कुछ सिखा सकता है। सुना है नेपाल की नई सरकार ने हाल ही में देश के सारे निजी स्कूलों को बंद करने का निर्णय लिया है। वहां यह व्यवस्था की जा रही है कि सारी शिक्षा सरकारी स्कूलों के माध्यम से दी जाये ताकि सब बच्चे एक जैसे स्तर की शिक्षा पा सकें। शिक्षा का अधिकार जितना ज़रूरी है, उससे कम ज़रूरी नहीं है शिक्षा का समुचित अवसर मिलना। शिक्षा को निजी और सरकारी में बांटने का मतलब अवसर की समानता के अधिकार को नकारना है। ज़रूरी है कि स्कूली शिक्षा प्रणाली और गुणवत्ता संवर्धन का विश्लेषण करने वाली इस रिपोर्ट पर देश में गहरा और व्यापक चिंतन हो। आज यह सवाल पूछे जाने की आवश्यकता है कि सरकारी स्कूल में पढ़ने का अर्थ घटिया शिक्षा पाना ही क्यों माना जाता है? क्यों नहीं हम सरकारी स्कूलों में ऐसी व्यवस्था कर सकते हैं कि हमारे बच्चे गर्व से कहें कि वे सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं? स्कूलों में पानी हो, बिजली हो, शौचालय हो, अच्छी साफ-सुथरी कक्षाएं हों- और बच्चों को पढ़ाने वाले सक्षम अध्यापक हों, इन अपेक्षाओं को पूरा क्यों नहीं किया जा सकता? क्यों यह नहीं सोचा जाता कि एकल अध्यापक वाले स्कूल में बच्चे उचित शिक्षा कैसे पा सकते हैं? बात शिक्षा के स्तर की होनी चाहिए। हम विश्व की सबसे बड़ी शिक्षा-प्रणाली वाला देश होने का दावा तो करते हैं, पर हमें इस बात पर शर्म क्यों नहीं आती कि हमारे स्कूलों में पांचवीं कक्षा में पढ़ने वाला बच्चा दूसरी कक्षा का पाठ भी अच्छी तरह से क्यों नहीं पढ़ पाता ?
निजी स्कूल इन और ऐसे प्रश्नों का उत्तर नहीं हैं। इसका उत्तर सरकारी स्कूलों को सक्षम बनाना है। पिछले एक अर्से में देश में 42,000 निजी स्कूल खुले हैं और इस दौरान देश के 13 करोड़ सरकारी स्कूल घटकर 12 करोड़ रह गये हैं! यह एक करोड़ स्कूल कहां गायब हो गये ? और क्यों गायब हो गये ? सवाल बहुत सारे हैं। दुख की बात यह है कि कोई इनका जवाब देने की आवश्यकता नहीं समझ रहा। नीट की परीक्षा में हुई गड़बड़ी निश्चित रूप से एक गंभीर बात है। देश के शिक्षा मंत्री को इस गड़बड़ी की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। लेकिन शिक्षा मंत्री को जिम्मेदारी इस बात की भी लेनी होगी कि प्राथमिक स्तर पर शिक्षण-व्यवस्था इतनी लचर क्यों है? क्यों सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं? क्यों सरकारी स्कूलों में शिक्षा के पर्याप्त साधन उपलब्ध नहीं है? क्यों स्कूलों में ऊंची कक्षाओं में बच्चों को बनाए रखना एक समस्या है? क्यों दस में से चार बच्चे माध्यमिक शिक्षा पूरी किये बिना ही स्कूल छोड़ देते हैं? इन और ऐसे सवालों के जवाब मांगना उतना ही ज़रूरी है जितना ‘नीट’ की परीक्षा का पारदर्शी होना।