नीट पेपर लीक और अन्य परीक्षाओं से जुड़ी अनियमितताओं के खिलाफ छात्रों ने जो कई सप्ताह लंबा आंदोलन चलाया, उसकी तार्किक परिणति सबके सामने है। सरकार को छात्र आंदोलन के सामने झुकना पड़ा। जिसके फलस्वरूप शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हुआ। एक बार फिर मोदी सरकार को आंदोलनकारियों के दबाव में फैसला लेना पड़ा। भाजपा के नेता कहते रहे हैं कि इस सरकार में मंत्रियों के इस्तीफे नहीं हुआ करते। युवाओं के इस आंदोलन ने किसान आंदोलन की याद ताजा कर दी, जब
सरकार को किसानों के एक साल चले आंदोलन के बाद तीन कृषि कानून वापस लेने पड़े थे। वहीं सरकार को उस संकट को स्वीकार करना पड़ा, जो भारतीय शिक्षा व्यवस्था में दशकों से शिकंजा कसे हुआ था। बहरहाल, सड़कों पर उतरे छात्रों के आंदोलन से साफ संदेश सामने आया कि अब भारत के युवा उस सिस्टम से जवाबदेही मांग कर रहे हैं, जो उनके भविष्य का निर्धारण करता है। एक और बात स्पष्ट रूप से सामने आई है कि युवाओं के इस आंदोलन ने देश के समक्ष मौजूदा दो सबसे बड़ी चुनौतियों – शिक्षा और
बेरोजगारी को फिर सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। ऐसा नहीं है कि इन मुद्दों पर चर्चा पहले नहीं हुई। लेकिन यह महज नीतियां बनाने और चुनावी भाषणों में चर्चा तक सीमित रह गया था। विडंबना यह है कि देश में एक के बाद एक आई सरकारों ने कभी इस चुनौती का सीधे तौर पर मुकाबला नहीं किया। वहीं इस छात्र आंदोलन ने यह भी साबित किया है कि हम जिस पीढ़ी को अक्सर महज ‘डिजिटल दुनिया में खोई हुई’ पीढ़ी मानते रहे हैं, वह पीढ़ी संस्थागत सुधारों के लिये पूरी चेतना के साथ सामने आ सकती है। निस्संदेह, शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद केंद्र को आत्ममंथन करना
चाहिए। लेकिन सुधार की उसकी इच्छा महज मंत्रियों और अधिकारियों को हटाने तक ही सीमित न रहे। ऐसी स्थिति में जब शिक्षा में सीमित सीटों और नौकरियों के लिये लाखों प्रतियोगी कड़ा मुकाबला करते हैं, सरकार सोचे कि प्रवेश परीक्षाओं को कैसे पारदर्शी व फूलप्रूफ बनाया जाए। इन्हें कितनी जिम्मेदारी के साथ आयोजित किया जाता है, इसकी गंभीरता से जांच होनी चाहिए। निस्संदेह, परीक्षा में धोखाधड़ी के खिलाफ प्रस्तावित कठोर कानून, फास्ट-ट्रैक कोर्ट और सख्त सजा आवश्यक कदम हो सकते हैं, लेकिन सिर्फ कठोर कानून मात्र से बिगड़ा हुआ ढांचा ठीक नहीं होगा। वास्तव
में नेशनल टेस्टिंग एजेंसी और सार्वजनिक परीक्षाओं के स्वरूप में पारदर्शिता, तकनीकी सुरक्षा और स्वतंत्र निगरानी जरूरी है। संसद में इन सुधारों पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए। सत्ता पक्ष के साथ ही विपक्ष भी समझ ले कि छात्रों के भविष्य को राजनीतिक बाजीगरी का अखाड़ा नहीं ही बनाया जाना चाहिए। भारत आज एक युवा देश है, जिसकी आधी से ज्यादा आबादी तीस साल से कम उम्र वाली है। ऐसे में हमें एक ऐसे शिक्षा तंत्र की जरूरत है, जो युवाओं का भरोसा कायम करे। साथ ही योग्य प्रतिभागियों को न्याय मिले। एक संदेश साफ है कि अब जेन-ज़ी को गंभीरता से लेना होगा।