
एक समय देश में विशिष्ट खाद्य पदार्थ माने जाने वाले पनीर को लेकर आज गहराता अविश्वास चिंता की बात है। मुनाफे के लिये उपभोक्ता के विश्वास से खिलवाड़ का यह धंधा पूरे देश में खूब चल रहा है। दिल्ली में सामने आया नकली पनीर का मामला इसी कड़ी का एक हिस्सा है। निस्संदेह, ये मामले हमारी खाद्य सुरक्षा व्यवस्था की एक बड़ी कमजोरी को ही उजागर करते हैं। ये विडंबना ही है कि किसी उत्पाद की लागत, उसमें प्रयोग की जाने वाली वस्तुओं और ग्राहक को इस बाबत दी जाने वाली जानकारी में अकसर विरोधाभास पाया जाता है। देश में एनालॉग पनीर की धड़ल्ले से बिक्री के पीछे भी मुनाफे का प्रलोभन ही है। जिसमें वेजिटेबल फैट, स्टार्च, प्लांट प्रोटीन और गैर डेयरी उत्पादों को मिलाया जाता है। दरअसल, यह पनीर, असली दूध वाले पनीर की तुलना में काफी सस्ता होता है और उत्पादकों के मुनाफे को बढ़ाता है। जानकारों का अनुमान है कि कीमतों का यह अंतर चालीस से पचास फीसदी तक हो सकता है। ऐसे में जब रेस्टोरेंट, कैटरर और खाने-पीने के दूसरे कारोबार कम मुनाफे पर करते हैं तो महंगे पनीर के जगह सस्ता पनीर इस्तेमाल करने का लालच होना एक स्वाभाविक बात है। दरअसल, इसका मतलब यह कतई नहीं है कि हर एनालॉग प्रोडक्ट वास्तव में खाने की दृष्टि से असुरक्षित ही होता है। वास्तव में मुख्य समस्या धोखा देने की है। यदि किसी डेयरी पदार्थों से मुक्त विकल्प की पहचान स्पष्ट तौर पर एनालॉग पनीर के तौर पर की जाती है, तो ग्राहक सोच-समझकर उसको खरीदने के बारे में फैसला स्वतंत्र रूप से ले सकते हैं। लेकिन सबसे बड़ी बात इसको लेकर ईमानदारी न होना है। जब विक्रेता इसे दूध का पनीर बताकर बेचने लगते हैं तो उपभोक्ता निर्णय नहीं ले पाते। ऐसे में असली पनीर वाली पौष्टिकता उन्हें नहीं मिल पाती। निर्विवाद रूप से इस मामले में रेस्टोरेंट सबसे कमजोर कड़ी के रूप में सामने आते हैं। जिनका मुख्य मकसद अपने मुनाफे को प्राथमिकता देना ही होता है।
वास्तव में जब भी कोई रेस्टोरेंट अपने किचन में एनालॉग पनीर आदि का इस्तेमाल करना शुरू करता है और उससे कोई व्यंजन बना लेता है तो ग्राहक नहीं समझ पाता है कि असली पनीर है या नकली पनीर है। देश के खाद्य पदार्थों का नियमन करने वाली संस्था एफएसएसएआई ने फूड-सर्विस देने वाले संस्थानों को स्पष्ट निर्देश दे रखे हैं कि वे यह सुनिश्चित करें कि पनीर वाली डिश में एनालॉग पनीर का इस्तेमाल ग्राहकों को सही जानकारी दिए बिना न किया जाए। इस विवाद के चलते देश के कई राज्यों ने कृत्रिम पनीर के खिलाफ सख्त कदम उठाए हैं। पंजाब सरकार ने इसके बनाने, संग्रहण करने, ट्रांसपोर्ट करने, बांटने और पनीर के नाम पर बेचने पर एक साल के लिये रोक लगा दी है। लेकिन यह भी एक हकीकत है कि एनालॉग पनीर के खिलाफ छापेमारी और उस पर प्रतिबंध लगाने मात्र से यह समस्या हल नहीं होने वाली है। दरअसल, नियामकों को उन आर्थिक कारणों पर भी गंभीरता से ध्यान देना होगा, जिसकी वजह से असली पनीर की जगह नकली पनीर का इस्तेमाल धड़ल्ले से किया जा रहा है। वास्तव में पनीर की जांच और गुणवत्ता के असली पनीर की उपलब्धता को सुनिश्चित करना जरूरी है। साथ ही तमाम रेस्टोरेंट व होटलों को उन खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता के लिये जवाबदेह बनाना होगा, जिन्हें वे खरीदते हैं और ग्राहकों को परोसते हैं। निस्संदेह, हर ग्राहक को इस बात का हक है कि वह जान सके कि वह किस तरह का पनीर खा रहा है। एनालॉग पनीर उत्पादकों को उत्पाद के पैकेट पर स्पष्ट रूप से लिखना अनिवार्य होना चाहिए कि यह एनालॉग पनीर है। इसके अलावा सवाल इसके अर्थशास्त्र का भी है कि यदि उत्पादक इसके जरिये मुनाफा कमा रहे हैं तो उपभोक्ता को उस कीमत के अंतर का लाभ मिलना चाहिए। साथ ही उन विक्रेताओं पर नकेल कसनी होगी जो असली पनीर की कीमत पर एनालॉग पनीर धड़ल्ले से बेच रहे हैं। वहीं दूसरी ओर ग्राहकों की सजगता भी इस समस्या के अंतिम समाधान में मददगार हो सकती है।