
भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती रही है कि यहां हर अलग राय व असहमति को सम्मान मिला है। निश्चय ही यह दृष्टि लोकतंत्र को मजबूत ही करती है। जब हम कहते हैं कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है तो प्रतिरोध की आवाज को सुनने के लिये नीति-नियंताओं को बड़ा दिल भी दिखाना चाहिए। एक बार फिर इस भावना की परीक्षा तब हो रही है, जब हमारे देश में लाखों बच्चों का भविष्य तय करने वाली प्रतियोगिता परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर सवाल उठे हैं। परीक्षा प्रणाली की शुचिता बनाये रखने के लिये शिक्षाविद् और इनोवेटर सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल एक अहम मोड़ पर पहुंच गई है। उनकी बिगड़ती सेहत को लेकर देश में चिंता है। उनका वजन काफी कम हुआ है, रक्त शकर्रा कम हुई है और कमजोरी आने की बात कही जा रही है। निश्चित रूप से राजनीतिक प्रतिबद्धताओं से हटकर उनकी खराब होती सेहत हमारी चिंता का विषय होना चाहिए। निश्चय ही वांगचुक किसी राजनीतिक दल से संबंध नहीं रखते और न ही वे यह आंदोलन किसी निजी लाभ के लिये कर रहे हैं। वे भले ही छात्रों के भविष्य के मुद्दे को लेकर अस्तित्व में आई ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के समर्थन में खड़े हुए हों, लेकिन उनकी चिंता के केंद्र में उन लाखों छात्रों का भविष्य है, जो प्रतियोगिता परीक्षाओं के तौर-तरीकों को लेकर अविश्वास जता रहे हैं। उनके आंदोलन के मूल में उन लाखों अभिभावकों की फिक्र है, जिनका भरोसा बार-बार पेपर लीक और परीक्षा प्रक्रियाओं में अनियमितताओं को लेकर डगमगा रहा है। कहना मुश्किल है कि लगाया जा रहा हर आरोप सही ही हो, लेकिन एक बात से तो इनकार नहीं किया जा सकता कि देश की कई महत्वपूर्ण प्रवेश परीक्षाओं में लोगों का विश्वास कम हुआ है। ऐसे में देश के नीति-नियंताओं को पारदर्शी सुधार लाकर और बेहतर जवाबदेही के माध्यम से दरके हुए विश्वास को जल्द बहाल करने की जरूरत है।
निर्विवाद रूप से ये लोकतंत्र का तकाजा भी है कि सत्ताधीशों को किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में उन नागरिकों की बात को भी सुनना चाहिए, जो नीतियों की विसंगतियों को लेकर सवाल उठा रहे हों। यह जानते हुए कि उनकी राजनीतिक दल विशेष से कोई प्रतिबद्धता नहीं है। निस्संदेह, देश में कोई भी सरकार जनता के अभिभावक के रूप में होती है। वैसे भी किसी शांतिपूर्ण विरोध की लंबे समय तक अनदेखी से आंदोलनकारियों और आम लोगों में सरकार के प्रति अविश्वास बढ़ता है। निस्संदेह, यदि आंदोलनकारियों से बातचीत की पहल होती है तो इसको उसकी कमजोरी नहीं कहा जाएगा। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भूख हड़ताल के नैतिक और चिकित्सीय पहलू भी होते हैं। सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह आंदोलन कर रहे व्यक्ति की अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान करते हुए उसके जीवन की रक्षा करे। वहीं दूसरी ओर किसी भी चिकित्सीय हस्तक्षेप के दौरान कानून और चिकित्सा-संबंधी नैतिक नियमों का पालन किया जाना भी जरूरी है। इस बात में दो राय नहीं है कि मौजूदा गतिरोध से किसी का भी भला नहीं हो सकता। सही मायने में बातचीत की शुरुआत करने के लिये सरकार को हर मांग को पूरा करने की जरूरत भी नहीं है। वहीं दूसरी ओर आंदोलनकारियों को भी बातचीत को सार्थक बनाने के लिये प्रयासरत रहने की जरूरत है। ऐसे में समस्या के समाधान के लिये एक भरोसेमंद समिति और चिंताओं से जुड़े मुद्दों पर विचार करने के लिये एक तय समय-सीमा वाला रोडमैप, भरोसे की कमी को दूर करने में मददगार साबित हो सकता है। सही मायने में इस आंदोलन के मानवीय पक्ष पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। यानी सरकार समझने की कोशिश करे कि इस आंदोलन के जन्म लेने के पीछे क्या भावनाएं काम कर रही थीं। साथ ही सरकार को शांतिपूर्ण विरोध के मूलभूत लोकतांत्रिक अधिकार का सम्मान करना चाहिए। निश्चित रूप से बातचीत के लिये किया गया कोई ईमानदार प्रयास गतिरोध को दूर करने में सहायक साबित हो सकता है। साथ ही इस बात की संवेदनशीलता का ध्यान रखना भी जरूरी है कि शासन की शिथिलता व उदासीनता की कीमत सोनम वांगचुक की सेहत को न चुकानी पड़े।