
अयोध्या में राम मंदिर में भक्तों द्वारा दिए दान और कीमती सामान की हेराफेरी की घटनाओं ने देश-विदेश के रामभक्तों को विचलित किया है। कभी आमजन में कहा जाता था कि ‘भगवान से डर’, लेकिन पैसे की हवस देखिए कि मंदिर प्रबंधन से जुड़े चंद लोगों ने भगवान के घर में चोरी करने में कोई डर महसूस नहीं किया। ये प्रबंधन व व्यवस्था की पारदर्शिता की खोट तो है ही, मानवीय मूल्यों के पतन की पराकाष्ठा भी है कि मंदिर में चढ़ावे की देखरेख को तैनात लोग ही चोरी-चकारी में लिप्त हो जाएं। इस मामले में विपक्ष के तीखे हमले और जनाक्रोश के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने मामले की जांच के लिए आनन-फानन में एसआईटी गठित की, रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपी, प्राथमिकी दर्ज की और वीरवार को प्रबंधन से जुड़े आठ कर्मचारियों की गिरफ्तारी भी हो गई। लेकिन अपने आराध्य राम के चढ़ावे की चोरी से आहत भक्तों के जख्मों पर शायद तभी मरहम लगेगी, जब दोषियों को सख्त सजा दी जाएगी। निश्चित ही यह चोरी का प्रकरण भाजपा व संघ को परेशान करने वाला है। उस राजनीतिक दल के लिये, जिसके कभी दो सांसद हुआ करते थे और राम मंदिर की मुहिम से हासिल जनसमर्थन से केंद्र व तमाम राज्यों में उसकी सरकारें बनी हैं। खासकर, भाजपा के लिए यह मुद्दा परेशानी का सबब हो सकता है क्योंकि राम जन्म भूमि वाले प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। जिस मुद्दे को लेकर भाजपा राज्य की सत्ता में आती रही है, उस मुद्दे पर विपक्ष हमलावर होगा। निस्संदेह, इस प्रकरण से राम भक्तों की आस्था को गहरी चोट तो पहुंची है। सवाल राम मंदिर ट्रस्ट की नाकामी पर भी उठेंगे कि उसने समय रहते इस चोरी को क्यों नहीं पकड़ा। बेहतर होता कि दोषियों के खिलाफ ट्रस्ट की तरफ से स्वतः प्राथमिकी दर्ज करके कार्रवाई की जाती। सवाल पूछा जा सकता है कि आखिर क्यों ट्रस्ट चंदे की रकम का हिसाब-किताब विश्वसनीय तरीके से नहीं रख पाया।
निश्चय ही इस प्रकरण से श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की साख भी दांव पर लगी है। वह उन भक्तों की भावनाओं की रक्षा नहीं कर पाया, जिन्होंने मंदिर निर्माण से लेकर अब तक दिल खोलकर दान दिया। जब चंदा प्रबंधन से जुड़े लोगों के घर से लाखों की नकदी बरामद हुई और चोरी के पैसे से जमीन खरीदने के आरोप सामने आए तो भक्तों की आस्था पर आंच आना स्वाभाविक ही है। आरोप सिर्फ नकदी के हेरफेर के ही नहीं लगे बल्कि कीमती गहनों को खुर्दबुर्द करने के भी लगे। वहीं प्राण-प्रतिष्ठा समारोह के दौरान दान में मिली चांदी की छड़ों के गायब होने का भी आरोप है। बहरहाल, 2027 के यूपी विधानसभा चुनावों से कुछ महीने पहले सामने आए इस विवाद ने प्रदेश में राजनीतिक हलचल मचा दी है। विपक्ष जहां दोषियों पर समय रहते कार्रवाई न करने का आरोप लगा रहा है, वहीं भाजपा इन आरोपों को अयोध्या को बदनाम करने और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने की कोशिश बता रही है। वहीं दूसरी ओर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने धैर्य रखने की अपील करते हुए कहा कि जिन भक्तों ने मंदिर निर्माण के लिए पांच सौ साल तक इंतजार किया, उन्हें एसआईटी जांच अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने का इंतजार करना चाहिए। उनकी दलील है कि इस शर्मनाक मामले की तह तक जाने के लिये एक पारदर्शी और समय-सीमा के भीतर होने वाली जांच बेहद जरूरी है। वहीं दूसरी ओर विपक्षी दल चंदे के रिकॉर्ड को सार्वजनिक करने और स्वतंत्र ऑडिट की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि लोगों के दान और धार्मिक आस्था से जुड़े मामले में कोई समझौता नहीं किया जाना चाहिए। निश्चित रूप से यह प्रकरण देश के बड़े धार्मिक संस्थानों में चंदे के प्रबंधन में पारदर्शिता व सतर्कता की मांग करता है। चंदे का नियमित ऑडिट किया जाना, तकनीक आधारित प्रबंधन, डिजिटल ट्रैकिंग और स्वतंत्र निगरानी वाले आधुनिक सिस्टम की जरूरत को दर्शाता है। निस्संदेह, राम मंदिर भारत व विदेशों में बसे करोड़ों श्रद्धालुओं की आकांक्षा का प्रतीक है। श्रद्धालुओं का भरोसा बनाये रखने के लिये हर आक्षेप की पारदर्शिता से जांच जरूरी है।