
शासन-प्रशासन के तमाम दावों के बावजूद आज भी पंजाब की नदियों को जहरीला बनाने का सिलसिला बदस्तूर जारी है। जिसकी पुष्टि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के समक्ष पंजाब पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड की स्वीकृति है कि आज भी आठ सौ से अधिक प्रदूषण के स्रोत राज्य की नदियों को प्रदूषित कर रहे हैं। निश्चय ही यह तथ्य उन विभागों व संस्थाओं के कामकाज पर सवालिया निशान है जो पर्यावरण संरक्षण के प्रबंधन से जुड़े हैं। साथ ही लंबे समय से अदालत के हस्तक्षेप व विभिन्न सर्वेक्षणों में सामने आए तथ्यों की पुष्टि
होती है कि राज्य में जागरूकता की कमी नहीं है, बल्कि समय रहते प्रभावी कार्रवाई न होने से उपजा संकट है। वर्षों से सरकारें एक्शन प्लान बनाने के दावे करती रही हैं। कभी ट्रीटमेंट प्लांट बनाने की बात होती है तो कभी कमेटियां बनाने के दावे होते हैं। आखिर क्यों आज भी बिना साफ किया हुआ सीवेज और औद्योगिक कचरा सतलुज, ब्यास और इनकी सहायक नदियों में बदस्तूर बहाया जा रहा है। जाहिर है, मौजूदा संसाधनों का या तो पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा है या उनका रखरखाव ठीक नहीं है। फलतः जन-स्वास्थ्य से जुड़ा
एक बड़ा संकट पैदा होता है। जो धीरे-धीरे आपदा का रूप ले लेता है। आज फैक्ट्रियों से निकलने वाले रसायनों के जरिये भारी धातुएं और जहरीले तत्व भूजल को प्रदूषित करने के बाद, हमारी खाद्य श्रृंखला में शामिल हो रहे हैं। जो राज्य के बहुचर्चित ‘कैंसर बेल्ट’ के रूप में हमारे सामने मौजूद है।
निस्संदेह, पंजाब में यदि हरित क्रांति का परचम लहराया तो उसके मूल में पंजाब की नदियों की बड़ी भूमिका रही है। लेकिन आज वे तंत्र की काहिली, अनियोजित शहरीकरण, नियम-कानूनों का क्रियान्वयन न होने और दोषियों को सजा न मिलने का दंड चुका रही हैं। एनजीटी
गाहे-बगाहे नगर निकायों की शिथिलता दर्शाकर सच्चाई से आम लोगों को अवगत कराता रहा है। निस्संदेह, पर्यावरण संरक्षण के प्रयास तब तक सफल नहीं हो सकते हैं जब तक कि इसकी जिम्मेदारी तय न की जाए और सख्त जुर्माना लगाना पर्यावरण संरक्षण नीति का हिस्सा नहीं बनता है। राज्य ने साबित किया है कि मरणासन्न नदियों को फिर से जीवित किया जा सकता है। काली बेईं को पुनर्जीवित करने में जागरूक लोगों की बड़ी भूमिका रही है। जो दर्शाता है कि पक्के इरादे के साथ किए गये प्रयास से बेहद बुरे हालात में पहुंच चुके जल स्रोत को भी जीवंत बनाया जा सकता है। लेकिन इक्का-दुक्का सफलताएं ही व्यापक रणनीति की जगह नहीं ले सकतीं। जरूरी है कि नियम-कानूनों का कड़ाई से पालन किया जाए, सार्वजनिक रिपोर्टिंग को पारदर्शी बनाएं तथा सीवेज एवं कचरा-शोधन प्रणालियों में निरंतर निवेश बढ़ाया जाए। सर्वविदित है कि पंजाब का नाम यहां की नदियों से पड़ा है। ऐसे में इन नदियों को खुले नाले बनते रहने देने से न केवल हमारा पारिस्थितिकीय तंत्र व लोगों का स्वास्थ्य प्रभावित होता है, बल्कि राज्य की खुशहाली व पहचान के लिये भी एक खतरा है। अब मजबूत राजनीतिक इच्छा शक्ति दिखाने का वक्त है।